परिंदा याद का, मेरी मुँडेरी पर नहीं आया
कोई भटका हुआ राही पलट कर घर नहीं आया
सभी ने ओढ़ कर चादर उदासी की यही सोचा
शजर पर क्यों बहारों का नया मंजर नहीं आया
मेरे हाथो की गर्मी से कहीं मुरझा न जाए वो
इसी डर से मैं नाज़ुक फूल को छूकर नहीं आया
मुखौटा दरमुखौटा थी हँसी, बस इसलिए ही तो
छुपा था जो मुखौटे में, नजर खंजर नहीं आया
चुभे हैं दिल में तेरे ऐ 'उषा' कुछ दर्द के काँटें
है अचरज क्यों उभर कर आह का इक स्वर नहीं आया ।
कोई भटका हुआ राही पलट कर घर नहीं आया
सभी ने ओढ़ कर चादर उदासी की यही सोचा
शजर पर क्यों बहारों का नया मंजर नहीं आया
मेरे हाथो की गर्मी से कहीं मुरझा न जाए वो
इसी डर से मैं नाज़ुक फूल को छूकर नहीं आया
मुखौटा दरमुखौटा थी हँसी, बस इसलिए ही तो
छुपा था जो मुखौटे में, नजर खंजर नहीं आया
चुभे हैं दिल में तेरे ऐ 'उषा' कुछ दर्द के काँटें
है अचरज क्यों उभर कर आह का इक स्वर नहीं आया ।
उषा जी, बेहद सधी हुई और नाज़ुक पंक्तियाँ ! बधाई ।
जवाब देंहटाएंwah, bahut umda kavita hai
जवाब देंहटाएंबहुत प्यारी सी ग़ज़ल उषा जी .. कुछ शेर सीधे दिल को छु गए ..
जवाब देंहटाएंदिल से बधाई स्वीकार करे.
विजय कुमार
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